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कर्ण पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
सम्पिष्टदग्धविध्वस्तं तव सैन्यं किरीटिना |  १७   क
हतं प्रविहतं वाणैः सर्वतः प्रद्रुतं दिशः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति