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कर्ण पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
महावने मृगगणा दावाग्निग्रसिता यथा |  १८   क
कुरवः पर्यवर्तन्त निर्दग्धाः सव्यसाचिना ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति