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कर्ण पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
उत्सृज्य हि महावाहुं भीमसेनं तदा रणे |  १९   क
वलं कुरूणामुद्विग्नं सर्वमासीत्पराङ्मुखम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति