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कर्ण पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
अपसव्यांस्तु तांश्चक्रे रथेन मधुसूदनः |  २५   क
ततस्ते प्राद्रवञ्शूराः पराङ्मुखरथेऽर्जुने ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति