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कर्ण पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्याम्वरमावृत्य शरजालानि भागशः |  ३   क
अदृश्यन्त तथान्ये च निघ्नन्तस्तव वाहिनीम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति