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शल्य पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
रजस्वलां द्रौपदीमानय़न्ये; ये चाप्यकुर्वन्त सदस्यवस्त्राम् |  १०   क
तान्पश्यध्वं पाण्डवैर्धार्तराष्ट्रा; न्रणे हतांस्तपसा याज्ञसेन्याः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति