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शल्य पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
हृष्टेन राजन्कुरुपार्थिवस्य; क्षुद्रात्मना भीमसेनेन पादम् |  १३   क
दृष्ट्वा कृतं मूर्धनि नाभ्यनन्द; न्धर्मात्मानः सोमकानां प्रवर्हाः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति