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शल्य पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
तव पुत्रं तथा हत्वा कत्थमानं वृकोदरम् |  १४   क
नृत्यमानं च वहुशो धर्मराजोऽव्रवीदिदम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति