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शल्य पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
मा शिरोऽस्य पदा मर्दीर्मा धर्मस्तेऽत्यगान्महान् |  १५   क
राजा ज्ञातिर्हतश्चाय़ं नैतन्न्याय़्यं तवानघ ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति