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शल्य पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
विध्वस्तोऽय़ं हतामात्यो हतभ्राता हतप्रजः |  १६   क
उत्सन्नपिण्डो भ्राता च नैतन्न्याय़्यं कृतं त्वय़ा ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति