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शल्य पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
उन्मत्तमिव मातङ्गं सिंहेन विनिपातितम् |  २   क
ददृशुर्हृष्टरोमाणः सर्वे ते चापि सोमकाः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति