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शल्य पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
तवापराधादस्माभिर्भ्रातरस्ते महारथाः |  २२   क
निहता ज्ञातय़श्चान्ये दिष्टं मन्ये दुरत्ययम् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति