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शल्य पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
स्नुषाश्च प्रस्नुषाश्चैव धृतराष्ट्रस्य विह्वलाः |  २३   क
गर्हय़िष्यन्ति नो नूनं विधवाः शोककर्शिताः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति