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शल्य पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
एवमुक्त्वा स वामेन पदा मौलिमुपास्पृशत् |  ५   क
शिरश्च राजसिंहस्य पादेन समलोडय़त् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति