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शल्य पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
नास्माकं निकृतिर्वह्निर्नाक्षद्यूतं न वञ्चना |  ८   क
स्ववाहुवलमाश्रित्य प्रवाधामो वय़ं रिपून् ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति