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वन पर्व
अध्याय १६३
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वैशम्पाय़न उवाच
यथा तुष्टो महादेवो देवराजश्च तेऽनघ |  ७   क
यच्चापि वज्रपाणेस्ते प्रिय़ं कृतमरिन्दम |  ७   ख
एतदाख्याहि मे सर्वमखिलेन धनञ्जय़ ||  ७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति