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आदि पर्व
अध्याय ५९
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वैशम्पाय़न उवाच
इमं तु वंशं निय़मेन यः पठे; न्महात्मनां व्राह्मणदेवसंनिधौ |  ५४   क
अपत्यलाभं लभते स पुष्कलं; श्रिय़ं यशः प्रेत्य च शोभनां गतिम् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति