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अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
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धृतराष्ट्र उवाच
अतिथिव्रताः सुव्रता ये जना वै; प्रतिश्रय़ं ददति व्राह्मणेभ्यः |  १९   क
शिष्टाशिनः संविभज्याश्रितांश्च; मन्दाकिनीं तेऽपि विभूषय़न्ति ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति