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आदि पर्व
अध्याय ५१
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सूत उवाच
तस्योत्तरीय़े निहितः स नागो; भय़ोद्विग्नः शर्म नैवाभ्यगच्छत् |  १०   क
ततो राजा मन्त्रविदोऽव्रवीत्पुनः; क्रुद्धो वाक्यं तक्षकस्यान्तमिच्छन् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति