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द्रोण पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
अद्य कृष्णश्च पार्थश्च धर्मराजश्च माधव |  ११   क
हते त्वय़ि निरुत्साहा रणं त्यक्ष्यन्त्यसंशय़म् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति