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विराट पर्व
अध्याय २३
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सैरन्ध्र्यु उवाच
वृहन्नडे किं नु तव सैरन्ध्र्या कार्यमद्य वै |  २१   क
या त्वं वससि कल्याणि सदा कन्यापुरे सुखम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति