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भीष्म पर्व
अध्याय ११५
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सञ्जय़ उवाच
भृशं तूर्यनिनादेषु वाद्यमानेषु चानघ |  १८   क
अपश्याम रणे राजन्भीमसेनं महावलम् |  १८   ख
आक्रीडमानं कौन्तेय़ं हर्षेण महता युतम् ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति