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शान्ति पर्व
अध्याय ५९
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वैशम्पाय़न उवाच
कथमेको महीं कृत्स्नां वीरशूरार्यसङ्कुलाम् |  ९   क
रक्षत्यपि च लोकोऽस्य प्रसादमभिवाञ्छति ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति