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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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व्यास उवाच
अस्तौषं त्वां तव संमानमिच्छ; न्विचिन्वन्वै सवृषं देववर्य |  ७२   क
सुदुर्लभान्देहि वरान्ममेष्टा; नभिष्टुतः प्रतिकार्षीश्च मा माम् ||  ७२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति