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शान्ति पर्व
अध्याय ९२
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उतथ्य उवाच
अप्रमादश्च शौचं च तात भूतिकरं महत् |  ५०   क
एतेभ्यश्चैव मान्धातः सततं मा प्रमादिथाः ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति