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सभा पर्व
अध्याय ५९
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विदुर उवाच
दुर्विभाव्यं भवति त्वादृशेन; न मन्द सम्वुध्यसि पाशवद्धः |  २   क
प्रपाते त्वं लम्वमानो न वेत्सि; व्याघ्रान्मृगः कोपय़सेऽतिवाल्यात् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति