वन पर्व  अध्याय ५९

वृहदश्व उवाच

स विनिश्चित्य वहुधा विचार्य च पुनः पुनः |  १३   क
उत्सर्गेऽमन्यत श्रेय़ो दमय़न्त्या नराधिपः ||  १३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति