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वन पर्व
अध्याय ५९
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वृहदश्व उवाच
ततो निवद्धहृदय़ः पुनरागम्य तां सभाम् |  १८   क
दमय़न्तीं तथा दृष्ट्वा रुरोद निषधाधिपः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति