वन पर्व  अध्याय ५९

वृहदश्व उवाच

सुप्ताय़ां दमय़न्त्यां तु नलो राजा विशां पते |  ८   क
शोकोन्मथितचित्तात्मा न स्म शेते यथा पुरा ||  ८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति