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विराट पर्व
अध्याय ५९
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वैशम्पाय़न उवाच
अग्निचक्रमिवाविद्धं सव्यदक्षिणमस्यतः |  १२   क
गाण्डीवमभवद्राजन्पार्थस्य सृजतः शरान् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति