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द्रोण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
ततः सर्वाणि सैन्यानि व्यद्रवन्त सुतस्य ते |  ७१   क
हतं श्रुताय़ुधं दृष्ट्वा काम्वोजं च सुदक्षिणम् ||  ७१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति