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आदि पर्व
अध्याय १३०
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वैशम्पाय़न उवाच
धर्मनित्यः सदा पाण्डुर्ममासीत्प्रिय़कृद्धितः |  २   क
सर्वेषु ज्ञातिषु तथा मय़ि त्वासीद्विशेषतः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति