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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्य च व्यदृश्यन्त विसर्पन्तो महाशराः |  २७   क
घभस्तय़ इवार्कस्य प्रतपन्तः समन्ततः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति