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वन पर्व
अध्याय १८२
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वैशम्पाय़न उवाच
ते तु दृष्ट्वैव तमृषिं विस्मय़ं परमं गताः |  १४   क
महदाश्चर्यमिति वै विव्रुवाणा महीपते ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति