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कर्ण पर्व
अध्याय ५९
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सञ्जय़ उवाच
तद्दृष्ट्वा कुरवस्तत्र विक्रान्तं सव्यसाचिनः |  ३३   क
निराशाः समपद्यन्त सर्वे कर्णस्य जीविते ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति