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कर्ण पर्व
अध्याय ५९
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सञ्जय़ उवाच
सम्भग्नं हि वलं दृष्ट्वा वलात्पार्थेन तावकम् |  ४२   क
धनुर्विस्फारय़न्कर्णस्तस्थौ शत्रुजिघांसय़ा |  ४२   ख
पाञ्चालान्पुनराधावत्पश्यतः सव्यसाचिनः ||  ४२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति