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शल्य पर्व
अध्याय ५९
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सञ्जय़ उवाच
उवाच चैनं संरव्धं शमय़न्निव केशवः |  ११   क
आत्मवृद्धिर्मित्रवृद्धिर्मित्रमित्रोदय़स्तथा |  ११   ख
विपरीतं द्विषत्स्वेतत्षड्विधा वृद्धिरात्मनः ||  ११   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति