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शल्य पर्व
अध्याय ५९
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सञ्जय़ उवाच
आत्मन्यपि च मित्रेषु विपरीतं यदा भवेत् |  १२   क
तदा विद्यान्मनोज्यानिमाशु शान्तिकरो भवेत् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति