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द्रोण पर्व
अध्याय १३१
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सञ्जय़ उवाच
विरथस्योद्यतं हस्ताद्धेमविन्दुभिराचितम् |  ४८   क
विशिखेन सुतीक्ष्णेन खड्गमस्य द्विधाकरोत् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति