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शल्य पर्व
अध्याय ५९
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वासुदेव उवाच
प्राप्तं कलिय़ुगं विद्धि प्रतिज्ञां पाण्डवस्य च |  २१   क
आनृण्यं यातु वैरस्य प्रतिज्ञाय़ाश्च पाण्डवः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति