शल्य पर्व  अध्याय ५९

सञ्जय़ उवाच

धर्मच्छलमपि श्रुत्वा केशवात्स विशां पते |  २२   क
नैव प्रीतमना रामो वचनं प्राह संसदि ||  २२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति