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शल्य पर्व
अध्याय ५९
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सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालाश्च सवार्ष्णेय़ाः पाण्डवाश्च विशां पते |  २७   क
रामे द्वारवतीं याते नातिप्रमनसोऽभवन् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति