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शल्य पर्व
अध्याय ५९
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सञ्जय़ उवाच
धर्मराज किमर्थं त्वमधर्ममनुमन्यसे |  २९   क
हतवन्धोर्यदेतस्य पतितस्य विचेतसः ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति