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शल्य पर्व
अध्याय ५९
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सञ्जय़ उवाच
इत्युक्ते धर्मराजेन वासुदेवोऽव्रवीदिदम् |  ३५   क
काममस्त्वेवमिति वै कृच्छ्राद्यदुकुलोद्वहः ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति