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शल्य पर्व
अध्याय ५९
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सञ्जय़ उवाच
यस्तु कर्तास्य वैरस्य निकृत्या निकृतिप्रिय़ः |  ४०   क
सोऽय़ं विनिहतः शेते पृथिव्यां पृथिवीपते ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति