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शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
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भीष्म उवाच
सर्वस्तरतु दुर्गाणि सर्वो भद्राणि पश्यतु |  ४५   क
श्रावय़ेच्चतुरो वर्णान्कृत्वा व्राह्मणमग्रतः ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति