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अनुशासन पर्व
अध्याय ६
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भीष्म उवाच
विपुलमपि धनौघं प्राप्य भोगान्स्त्रिय़ो वा; पुरुष इह न शक्तः कर्महीनोऽपि भोक्तुम् |  ४५   क
सुनिहितमपि चार्थं दैवतै रक्ष्यमाणं; व्ययगुणमपि साधुं कर्मणा संश्रय़न्ते ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति