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शल्य पर्व
अध्याय ४२
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वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा तोय़ं सरस्वत्या मुनिभिस्तैस्तथा कृतम् |  १४   क
कृताञ्जलीस्ततो राजन्राक्षसाः क्षुधय़ार्दिताः |  १४   ख
ऊचुस्तान्वै मुनीन्सर्वान्कृपाय़ुक्तान्पुनः पुनः ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति