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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६
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नारद उवाच
तस्या द्वारं समासाद्य न्यसेथाः कुणपं क्वचित् |  २३   क
तं दृष्ट्वा यो निवर्तेत स संवर्तो महीपते ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति