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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
तस्य रूपं शरस्यासीद्धनुर्ज्यामण्डलान्तरे |  ११५   क
द्योततो भास्करस्येव घनान्ते परिवेशिनः ||  ११५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति